बेरोज़गारी बढ़ती ही जा रही है,
सुरसा के मुख सम खुलती ही जा रही है।
चयन हुआ पर नियुक्ति नहीं है,
युवाओं की प्रतीक्षा बढ़ती ही जा रही है।
दो-दो वर्ष से प्रतीक्षा कर रहे युवा,
अब तो यह प्रतीक्षा खलती ही जा रही है।
कोई कैसे कहे दर्द अपना,
नौकरी पाना बन गया है एक सपना।
चयन होने के पश्चात भी, दर-दर भटक रहे हैं
ताने मारें पड़ोसी, हंसी उड़ाएं कुटुंबी,
सबके तंज की मार दिल पर,सहते ही जा रहे हैं
ये युवा यूं ही पिसते ही जा रहे हैं।।
____✍️गीता
बढ़ती हुई बेरोज़गारी
Comments
4 responses to “बढ़ती हुई बेरोज़गारी”
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अतिसुंदर रचना
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बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी🙏
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सुन्दर रचना
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बहुत-बहुत धन्यवाद ऋषि जी
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