बता तो दो

बता तो दो क्यू तुम ऐसे हो,
मेरे होकर भी परायों से कमतर हो।
यक़ीनन दोष हममें, दुनियादारी की बूझ नहीं
आकलन करें कैसे, रिश्ते- नातोंकी समझ नहीं
साफ़ कहने की आदत, सुनने की हिम्मत नहीं
पर क्या सारा दोष मेरा,तुम पाक वारी जैसे हों
बता दो क्यूं तुम ऐसे हो।
अपने जो हैं उनकी बातो पे चिलमन डालना
कङवी-से-कङवी लब्ज को हंस के टालना
इतना ही सीखें हो, कही बातों का गिरह बांधना
ये गांठ बेधते मन को, कोई नासूर जैसे हों
बता दो क्यूं तुम ऐसे हो।

Comments

4 responses to “बता तो दो”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर भाव

  2. Geeta kumari

    हृदय के भावों का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करती हुई सुंदर रचना

  3. Satish Pandey

    बता तो दो क्यू तुम ऐसे हो,
    मेरे होकर भी परायों से कमतर हो।
    यक़ीनन दोष हममें, दुनियादारी की बूझ नहीं
    आकलन करें कैसे, रिश्ते- नातोंकी समझ नहीं
    साफ़ कहने की आदत, सुनने की हिम्मत नहीं
    —— वाह, कवि सुमन जी की बहुत ही उत्तम रचना है यह। टीस व संवेदना का बहुत सुंदर समन्वय है यह कविता।

  4. Rajeev Ranjan Avatar
    Rajeev Ranjan

    Laajawab

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