बरसात की ऋतु

अब धीरे-धीरे समेटने लगी है
वह अपने साजो – सामान को,
तपती गर्मी से झुलसती धरती को
नहलाने आयी थी,
प्यासे प्राणियों को
खूब पानी पिला गई।
धरती पर पड़े बीजों को उगा गई।
ये बरसात की ऋतु थी
जो तन मन को नहला गई।
धरती को महका गई।

Comments

2 responses to “बरसात की ऋतु”

  1. वर्षा ऋतु का बहुत सुन्दर चित्रण प्रस्तुत करती हुई कवि सतीश जी की अति सुन्दर रचना

    1. बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी

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