बादल की बौछार

दो बूँद गिरा गया बादल
महका है धरती का आँचल
बन सर्द पवन लहराई
मिट्टी की महक-महकाई

सब काम काज रुक गए हैं
बादल के आगे झुक गए हैं
ममता ने ली है अंगड़ाई
लो सब ने प्यास बुझाई

खामोश हुआ इंसान जब
पड़ी गर्ज की चमक दिखाई

पानी-की बौछार चलाके
संगीत में सूर को मिलाके
गालों को मर्म सहलाएँ
कानों से थरथरी आएँ

सप्तधनू आकाश में छाया
देने सूक्ष्म श्रेस्ट बधाई

दो बूँद गिरा गया बादल
महका है धरती का आँचल
बन सर्द पवन लहराई
मिट्टी की महक-महकाई
©M K Yadav

Comments

12 responses to “बादल की बौछार”

  1. Geeta kumari

    बहुत सुंदर रचना

    1. M K Yadav

      CG ati-aabhar

    1. M K Yadav

      धन्यवाद ऋषि

    1. M K Yadav

      🙏🙏🙏

    1. M K Yadav

      shukriya Vinay G 🙏

    2. M K Yadav

      shukriya Aapka

  2. दो बूँद गिरा गया बादल
    महका है धरती का आँचल
    — बहुत सुन्दर

    1. M K Yadav

      शुक्रिया! शुक्रिया सतीश जी 🙏
      Thank you so much 👏👏👏

  3. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर कविता।

Leave a Reply

New Report

Close