बादल

सोंचता हूँ अपनी एक नई दुनियाँ बना लूँ,
जिसमे अपनी ही मनचाही तस्वीरें लगा लूँ,
खुशियों के बिस्तर बिछा लूँ और दुखों को अपने घर का रस्ता भुला दूँ,
सूरज चँदा को अपनी छत पर लटकाकर,
जब चाहे बादलों से कहूँ और वर्षा करा लूँ,
इंद्रधनुष को बोल के सारे रंग निकलवाकर,
अपने दिल ओ दिवार पर सारे रंग करा लूँ,
चिड़ियों को कहूँ के वो हर दिन गाना सुनाएँ,
और अपनी आँखों पर रातों की चादर उढ़ा लूँ।।
राही (अंजाना)

Comments

3 responses to “बादल”

  1. राम नरेशपुरवाला

    वह

  2. राम नरेशपुरवाला

    सुन्दर

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