बुरा ना मानो होली है!
जोगीरा सा रा रा,
होली आई, होली आई.
बीत गयी बसंत, लौटी है फिर से फागुन के होली की उमंग.
भांग पीकर सब ऐसे मस्त पडे़ है,
जैसे दुनिया के सारे रंजोगम से बेखबर लग रहे है.
बच्चों की टोली आई,
रंगों के साथ खुशियाँ लाई.
कि
कई मीठे पकवान बने हैं,
बड़े तो बड़े दादाजी भी झूम रहे हैं .
याद आ गई बचपन की वो बातें,
पिचकारी में भरके रंगों को दूसरों पर उड़ेलना .
और दूसरों का
बुरा ना मानो होली है!
Comments
3 responses to “बुरा ना मानो होली है!”
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आदरणीय संपादक महोदय मैं नवनीता कुमारी मैंने अपनी पूरी रचना बुरा ना मानो होली है जीमेल से आपको भेजी है क्योंकि सावन के साइट पर पूरी रचना पब्लिश नहीं हो पा रही थी कृपया इसे प्रकाशित करने का कष्ट करे.
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हमें आपकी मेल प्राप्त नहीं हुई है, आप अपनी कविता हमें +91 91168 00406 पर व्हाट्सएप कर सकतें हैं।
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Great
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