कुछ जहाँ थे वहीं हैं
कुछ पहुँचे आकाश
कुछ की हालत दीन है
कुछ हैं मालामाल।
बेकारी ने छीन लिया
युवा दिलों का जोश,
मेहनत की मजदूर ने
फिर भी खाली कोष।
फिर भी खाली कोष
कभी कुछ बचा नहीं
रोज कमाया, खाया
हाथ कुछ रहा नहीं।
कुछ के पास अपार
संपदा पड़ी हुई है,
कुछ की निर्धनता
अपने में ही अड़ी हुई है।
बेकारी ने छीन लिया
Comments
3 responses to “बेकारी ने छीन लिया”
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अतिसुंदर अभिव्यक्ति
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बहुत खूब वाह
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“कुछ के पास अपार संपदा पड़ी हुई है,
कुछ की निर्धनता अपने में ही अड़ी हुई है।”
कवि सतीश जी की बहुत ही सच्ची पंक्तियां है कवि ने समाज का पूर्ण रूप से अवलोकन कर के है ये पंक्तियां लिखी हैं, भारत देश में तो ऐसा ही हो रहा है,धन का असमान वितरण ही यह स्थिति बनाए हुए है।
बहुत खूब बहुत सुंदर कविता, उत्कृष्ट लेखन
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