बेरुखी

बेरुखी से बड़ी सजा ही नहीं ,
खता क्या थी, पता ही नहीं
वो इस कदर दूर हो गए ,
कभी पास भी थे क्या,
अब तो ऐसा लगता ही नहीं ।।

Comments

14 responses to “बेरुखी”

  1. वाह वाह, अतिसुन्दर

    1. बहुत बहुत धन्यवाद पीयूष जी

  2. वाह, बहुत ही खूबसूरती से मानवीय मनोभावों का चित्रण किया है। श्रृंगार के वियोग पक्ष की झलक है। सुन्दर भावाभव्यक्ति

    1. सुंदर समीक्षा हेतु सादर धन्यवाद सर🙏

  3. बहुत खूब वाह

    1. बहुत बहुत धन्यवाद जोशी जी 🙏

  4. Seema Chaudhary

    बहुत ही खूबसूरती से हृदय के भाव स्पष्ट किए गए है । विरह वेदना का सटीक वर्णन ।

  5. सुन्दर अभिव्यक्ति

  6. सुन्दर अभिव्यक्ति

  7. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. बहुत धन्यवाद

    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका भाई जी 🙏 सादर आभार

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