*मंज़िल*

दीप तले अंधेरा है
निशा के बाद सवेरा है
ना डर देखकर मुश्किल
मंज़िल को तेरा इंतजार है

*****✍️गीता

Comments

6 responses to “*मंज़िल*”

  1. प्रेरक दो पंक्तियां👏👏👏👌👌👌

    1. आभार भाई जी🙏

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