ऊंचे उड़ना चाहता, है मेरा मन आज,
लेकिन पंख उगे नहीं, माने खुद को बाज।
माने खुद को बाज, हवा में उड़ता है बस,
भूल असलियत स्वयं, भूमि पर गिरता है बस।
कहे लेखनी उड़ो, मगर तुम पंख उगाओ,
निज मेहनत से तुम, सच्ची मंजिल को पाओ।
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चादर छोटी रह गई, पैर देखते ख्वाब,
ठंड लग रही ठंड को, आग में है अब्वाब।
आग में है अब्वाब, मिटे अब कैसे ठिठुरन,
चादर छोटी नहीं, मगर उसमें है सिकुड़न।
कहती कलम जितनी, चादर है पैर खोलिए,
छोड़ सभी उलझनें, खुशी के बोल बोलिए।
—— डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय
विशेष- कुंडलिया छन्द।
मगर तुम पंख उगाओ(कुंडलिया छन्द)
Comments
5 responses to “मगर तुम पंख उगाओ(कुंडलिया छन्द)”
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बहुत ही शानदार लिखा है पाण्डेय जी।
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बहुत खूब
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बहुत सुंदर
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अतिसुंदर
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एक कविता के अंतर्गत दो कविताओं का कुंडलिया छन्द में अनूठा मिश्रण है।
कहे लेखनी उड़ो, मगर तुम पंख उगाओ,
निज मेहनत से तुम, सच्ची मंजिल को पाओ।
____ सच्ची मेहनत के बारे में बताती हुई कवि सतीश जी की
उम्दा रचना।
“कहती कलम जितनी, चादर है पैर खोलिए,
छोड़ सभी उलझनें, खुशी के बोल बोलिए”
_____मनुष्य को किसी भी परिस्थिति में खुश रहने की सलाह देती हुई बहुत सुंदर रचना, सुंदर भाव और सुंदर शिल्प
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