मत सोचो

ठंड की बरसात में
घर के भीतर छाता ओढ़कर
सोने की मत सोचो
दिखावे का रोना
रोने की मत सोचो।
मुँह चुराकर
निकल जाने की मत सोचो।
केवल खुद ही
खाने की मत सोचो।
अपनी खुशी के ही
गीत गाने की मत सोचो।
जो जरूरतमंद हैं
भूखे हैं, वस्त्रहीन हैं
उनकी भी मदद कर लो
सब कुछ खुद ही
पाने की मत सोचो।

Comments

4 responses to “मत सोचो”

  1. Geeta kumari

    इस कविता के माध्यम से कवि सतीश जी ने ये बताने की कोशिश की है कि किसी भी व्यक्ति को केवल अपने बारे में ही नहीं सोचना चाहिए, औरों के बारे मे भी विचार करना चाहिए। बहुत ही उत्तम विचार हैं कवि के। सुन्दर शिल्प एवम् सुंदर भाव लिए हुए लाजवाब प्रस्तुति

  2. बहुत ही सुन्दर कविता लिखी है सर आपने।

  3. बहुत ही बढ़िया कविता

  4. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    वाह
    पाण्डेयजी बहुत सुंदर अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग
    “घर के भीतर छाता ओढ़कर” और बहुजनन हिताय की भावना कविता में चार चांद लगता है। अतिसुंदर रचना।।

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