नजारा गजब दिखा
किसी ऊँचे रसूख की पार्टी में,
बचा हुआ खाना
सामने के कूड़ादान में
फैंका गया,
कुछ उसके अंदर पड़ा
कुछ सड़क गिरा,
फिर जानवरों द्वारा
इधर उधर
फेंटा गया,
सुबह वहां पर पत्थर तोड़ती
वह माँ,
अपने नन्हें शिशु के साथ आई,
उसने बच्चे के लिए चटाई बिछाई,
वो पत्थर तोड़ने में व्यस्त है
बच्चा पास में पड़े चावल के दाने
चाव से खा रहा था,
वहीं पर एक सांड, कुछ चीटियों
तमाम तरह के कीड़े-मकोडों को
पार्टी के भोजन का
आनंद आ रहा था।
लोग बोल रहे थे कैसी है,
बच्चा गिरा हुआ खा रहा है,
मना नहीं कर रही है।
मना नहीं कर रही है
Comments
2 responses to “मना नहीं कर रही है”
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अतिसुंदर भाव
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ओह! मार्मिक अभिव्यक्ति से परिपूर्ण कवि सतीश जी की हृदय को छूती हुई बेहद संजीदा रचना
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