मन के घोटक में बैठ कर दौड़ा
किस दिशा में कहाँ चला राही,
इस तरफ उस तरफ धरा-अंबर
आया क्या हाथ में बता छनकर।
खूब रख ईप्सा चला दौड़ा,
वैसी ले दीक्षा चला दौड़ा,
मन में सुरपति की कामना लेकर
रात दिन वह चला, चला दौड़ा।
इस इला में कदम रखे तन ने
आस में भूल वह गया सब कुछ
बस जरा सा हवा उठी मन में
उस हवा संग वह उड़ा, दौड़ा।
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