मन बड़ा चंचल

यह मन बड़ा चंचल
कभी डोलता इधर
कभी डोलता उधर
ना जाने कब हो जाए किधर
कभी दूजे की
कभी अपनी फिकर
मन में चलता रहता उछल-पुथल
कभी रहती सद्भावना
कभी रहता स्वार्थ
कभी सोचे मुनाफा
कभी काज करे परमार्थ
कभी होता अधीर
कभी हो जाता विह्वल
यह मन बड़ा चंचल
–✍️ –एकता

Comments

6 responses to “मन बड़ा चंचल”

  1. राकेश पाठक

    Nice

  2. अतिसुंदर रचना 

    1. धन्यवाद शास्त्री जी

    1. धन्यवाद प्रज्ञा जी

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