जमीं को खोदकर अपना आसमान ढूंढते है
पसीने की हर एक बूँद से अनाज उगाते है
सबके मोहताज होने के बाद भी
यह किसान हम सब की भूख मिटा जाते है
सूखापन जमीं के साथ-साथ
इनके जीवन में भी आ जाता
मेघ के इंतजार में यह जवान
कभी बुढ़ा भी हो जाता
अपना स्वार्थ कभी न देखकर यह
हमारी भूख मिटाकर खुद
भूखा ही मर जाता
पानी की याद में यह अपनी नैना मूंदते है
जमीं को खोदकर अपना आसमान ढूंढते है
धरती का सीना चीर यह
जीवन उगाते है
दो बैलों के बीच हमारे लिए
अपनी जिंदगी लुटाते है
हमारे में तो बस ईर्ष्या क्रोध
घृणा ही समाई है
असली इंसानियत का
रिश्ता यही निभाते है
तिनकों की तरह अपने आप को मिटाते हैं
जमीं को खोदकर अपना आसमान ढूंढते है
इनकी आखों का सागर
सूखी जमीं के लिए काफी नहीं
इनकी मौत हमारी इंसानियत है
कोई रस्सी की फांसी नहीं
गृहस्थी और जीवन के कर्ज का किसान
हमारे इस जुर्म की कोई माफी नहीं
हर सुबह के सपने रात मे फिर टूटते हैं
जमीं को खोदकर अपना आसमान ढूंढते है
अंतिम में बस यही लिखूंगा,
किसान को अपनी भावना की डोर बंधाओ
मरते जवान की जवानी बस आप बचाओ
किसान को मिटते देखकर भी क्यूँ करते है गुमान
अब आप ही बताओ कैसे कहूँ मैं,
मेरा भारत महान
मेरा भारत महान………..!!
“
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