माँ

बनाकर खुद से खुद पर ही हैरान हो गया,

मेरी माँ की सूरत के आगे वो बेजान हो गया,

भेज दिया जिस पल मेरे घर में माँ को उसने,

उसका खुद का घर जैसे मानो वीरान हो गया,

आसमाँ पर जब तब नज़र चली जाती थी कभी,

आज कदमों में ही माँ के मेरा आसमान हो गया।।

राही (अंजाना)

Comments

2 responses to “माँ”

  1. Kanchan Dwivedi

    Nice

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    सुन्दर प्रस्तुति

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