मिठास बढ़ने दे

रागिनी गा दे
या गाए बिना सुना दे
भीतर है जो उबाल
उसे बाहर निकलने दे।
मन की जुल्फों को उलझने दे
दिल की लगी को चारों ओर
बिखरने दे।
उसकी तपिश से बर्फ पिघलने दे।
हिलोरे उठने दे,
फलों की मिठास बढ़ने दे,
अपनेपन का अहसास होने दे
खुशी के आंसू रोने दे,
अधखिले फूल खिलने दे।
त्रिपुट में लगाने को
जरा चन्दन घिसने दे,
ठण्ड में अधिक ठंड का
अहसाह करने दे,
यूँ जकड़े न रह
जरा हिलने-डुलने दे।

Comments

10 responses to “मिठास बढ़ने दे”

  1. Geeta kumari

    प्रकृति से मानव मन की बहुत ख़ूबसूरती से तुलना की है कवि सतीश जी ने । बहुत सुन्दर कविता

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. बहुत खूब, very nice

    1. Satish Pandey

      Thank you

  3. अति सुंदर

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  4. Pragya Shukla

    त्रिपुट में लगाने को
    जरा चन्दन घिसने दे,
    ठण्ड में अधिक ठंड का
    अहसाह करने दे,
    यूँ जकड़े न रह
    जरा हिलने-डुलने दे।

    यह पंक्तियां कवि के मन की
    असीमित अतृप्तियों के संयोग का संगम है
    प्रकृति के माध्यम से अपने हृदय के
    सुंदर भावों से अवगत कराती कवि सतीश जी की रचना

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत आभार

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

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