मुक्तक

काश तुमसे चाहत को बोल पाता मैं भी!
काश गाँठें लफ्जों की खोल पाता मैं भी!
ठहरी हुई निगाहें हैं मेरी पत्थर सी,
काश तेरी बाँहों में डोल पाता मैं भी!

मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

Comments

3 responses to “मुक्तक”

  1. Panna Avatar

    ख़्वाहिशें मेरी उड़ती पतंग की तरह हे
    ख़यालों की हवा में बस उड़ती जाती हैंl

  2. राम नरेशपुरवाला

    Good

  3. Abhishek kumar

    Nice

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