मुक्तक

मुक्तक

दस्तक क्युँ करते हो बार बार,
बिहड़ मन उपवन के सुने द्वार।
न छेड़ो प्रेमागम की तार को,
चुभत है दिल पे इनकी झनकार।

Comments

2 responses to “मुक्तक”

  1. Abhishek kumar

    Wow

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