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  1. लफ्ज कभी खत्म ना हो, बात से बात चले।
    मै तेरे साथ चलूं , तू मेरे साथ चले।

    खामोश न हो एै मन्जर , पाक इश्क का
    बज्म़-ए- इश्क हम, गुगुनाते साथ चले।

    गुलिस्ता मे गुल खिलते रहे, मुस्कुराते रहे ,
    और वादा-ए-वफा इश्क निभाते साथ चले।

    न हो दुरियॉ हम, अल्फाजों मे भी कभी,
    निगाहों से निगाहें मेरी ,कब्र तक साथ चले।

    जले तो जले लाख जमाना , यै ” योगेन्द्र “,
    मै तेरे साथ चलूं , तू मेरे साथ चले।

    योगेन्द्र कुमार निषाद
    घरघोड़ा (छ.ग.)

  2. अगर हो न पाए तू कभी मेरी
    बस यही दुआ है रव से,
    अगर उठे तेरी ड़ोली, तो अर्थी मेरी तेरे साथ चले।
    लफ्ज कभी खत्म न हो,बात से बात चले
    मै तेरे साथ चलु, तू मेरे साथ चले

    1. मुशायरे में सबमिट की गई आपकी कविता आगाज करने वाली पंक्ति से संबधित नहीं है | कृपया आप अपनी कविता को बदलें| आप अपनी कविता बदलने के लिए हमें भेज सकते है

      1. Hello Saurabh,

        Congratulations!
        You received highest votes in recent Mushyaira. Please send your Paytm Contact number, so that we can send your prize money.

        Thanks
        Team Saavan

  3. ज़िन्दगी वो ही नही है कि दिन हो सदा
    हमारी आरज़ू है साथ मेरे रात चले
    तेरे बिना कुछ भी नही हूँ ,जानता हूँ
    तेरे होने से ही हमारे ख्यालात चले

    1. लफ्ज़ कभी ख़त्म ना हों, बात से बात चले,
      मैं तेरे साथ चलूँ, तू मेरे साथ चले,
      खामोशी एक पल न हो, मन में छिप कर न एहसास पले,
      जब तक चन्दा सूरज चाँद रहें, हम दोनों की भी बात चले।।
      राही (अंजाना)

  4. लफ़्ज कभी खत्म ना हो, बात से बात चले
    मैं तेरे साथ चलूं, तू मेरे साथ चले|

    परेशान नही रहता मैं मुश्किलातों में,
    अपने साथ तो सदा माँ का आशीर्वाद चले ……

    मशूहर होना कौन चाहता हैं कम्बख़्त ये अंजान,
    बस जब भी चले हर महफ़िल में अपनी बात चले…..

    अंजान बेतुका
    9990225111

  5. मै बस यही चाहता हू, जितने पल हम साथ गुजारे,
    हाथो मे हाथ डाल चले।
    अगर मिल न पाए तू मुझे, तो दुआ है रव से,
    अगर उठे तेरी ड़ोली, तो अर्थी मेरी तेरे साथ चले ।
    लफ्ज कभी खत्म न हो, बात से बात चले
    मै तेरे साथ चलु, तू मेरे साथ चले।
    सौरभ धर्मा।

  6. लफ्ज कभी खत्म ना हो, बात से बात चले।

    मै तेरे साथ चलूं , तू मेरे साथ चले।

    सिलसिला कभी ये खत्म ना हो, बस संग यूहीं दिन रात चले ।

    मै तेरे साथ चलूं , तू मेरे साथ चले।

    सफर लम्बा तय करना है, डालें हाथों में हाथ चले।।

    मै तेरे साथ चलूं , तू मेरे साथ चले।

  7. लफ्ज कभी खत्म ना हो, बात से बात चले।
    मै तेरे साथ चलूं , तू मेरे साथ चले।

    कहने को क्या बचा है जो कुछ कहूं तुझसे
    खामोशी ही बची है अब, यही बस दरम्या चले|

  8. आगाज कुछ ऐसा हो
    कि ना फिर अंजाम की बात चले,
    लफ्ज कभी खत्म ना हो,बात से बात चले,
    मैं तेरे साथ चलूँ, तू मेरे साथ चले।
    हो मयस्सर तेरी राहों को, गुलिस्ताँ औ अंजुम,
    रंज और गम की,तेरे जीवन से हर रात ढले।

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