मेरा कमरा, तुम्हारी यादें बस ऐसे ही
हुई आंखों से बरसातें बस ऐसे ही,
ये कमरे में बिखरे पन्ने बस ऐसे ही
अजी लिखना-विखना छोड़ो बस ऐसे ही।
ये उलझी – उलझी जुल्फें बस ऐसे ही
ये बिन काजल की आंखें बस ऐसे ही।
आंखों से नींदें रुखसत बस ऐसे ही
हर जिम्मेदारी से फुर्सत बस ऐसे ही।
ये फीके फीके होंठ बस ऐसे ही
ये पैरों में कैसी चोट बस ऐसे ही।
क्यों रखती नहीं खयाल बस ऐसे ही
क्यों हालत है बेहाल बस ऐसे ही ।
तुम खुश तो हो उसके साथ या बस ऐसे ही
या फिर होंठों पर मुस्काने बस ऐसे ही।
क्यों झुकती शर्म से आंखें बस ऐसे ही
क्या दिल में अब भी चोर बस ऐसे ही।
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