मेरा मन ये कहता था के यह फिर इस बार नहीं होगा,
मैं आगे बढ़ गया हूँ अब फिर पीछे कदम नहीं होगा,
फिर मन में जिज्ञासा थी फिर कुछ पाने की आशा थी,
एक बार गिरा फिर उठ बैठा और उठकर फिर मैं चलने लगा,
पर चलते चलते मेरे मन में फिर संशय सा पलने लगा,
मेरा मन ये कहता था के यह फिर इस बार नहीं होगा,
मैं भी ज़िद्दी था बचपन से फिर अपनों से भिड़ने लगा,
जो देखे थे सपने मैने फिर उनको मैं बुनने लगा,
जगते जगते जब मैं अपने स्वप्नों की चादर चुनने लगा,
फिर आकाश से वापस गिरकर मैं धरती से मिलने लगा,
मेरा मन ये कहता था के यह फिर इस बार नहीं होगा,
सूरज की किरणों सा जब भी मैं उज्ज्वल जल होने लगा,
फिर सहसा साँझ दूजे पल से मैं धुन्धला धुन्धला होने लगा,
मेरा मन ये कहता था के यह फिर इस बार नहीं होगा॥
~ राही (अंजाना)
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