उठाई थी कलम कुछ अनसुलझे
सवाल लिखने के लिए।
अपने दिल के ज़ज्बात
ना जाने कब लिखने लगी।
लोग कहते हैं कि
मैं बहुत अच्छा लिखने लगी।
बस जितनी तकलीफें
मिलती रहीं तुझसे,
“मेरी कलम की धार”
उतनी तेज चलने लगी।
रूबरू होते गए हम
तेरे दर्द से जितना
मेरी आँखों से मोतियों की
लड़ी झड़ने लगी।
किस्से तो रोज सुनती थी
इश्क, मोहब्बत के।
पर ना जाने कब!
मैं भी तुझसे प्यार करने लगी।
रोका बहुत था मैंने अपने दिल को,
पर तुझे देखते ही मैं तुझ पर मरने लगी।
लोग कहते हैं कि
मैं बहुत अच्छा लिखने लगी।
पर मैं तो बस तेरा दिया हर दर्द लिखने लगी।