उठाई थी कलम कुछ अनसुलझे
सवाल लिखने के लिए।
अपने दिल के ज़ज्बात
ना जाने कब लिखने लगी।
लोग कहते हैं कि
मैं बहुत अच्छा लिखने लगी।
बस जितनी तकलीफें
मिलती रहीं तुझसे,
“मेरी कलम की धार”
उतनी तेज चलने लगी।
रूबरू होते गए हम
तेरे दर्द से जितना
मेरी आँखों से मोतियों की
लड़ी झड़ने लगी।
किस्से तो रोज सुनती थी
इश्क, मोहब्बत के।
पर ना जाने कब!
मैं भी तुझसे प्यार करने लगी।
रोका बहुत था मैंने अपने दिल को,
पर तुझे देखते ही मैं तुझ पर मरने लगी।
लोग कहते हैं कि
मैं बहुत अच्छा लिखने लगी।
पर मैं तो बस तेरा दिया हर दर्द लिखने लगी।
“मेरी कलम की धार”✍
Comments
17 responses to ““मेरी कलम की धार”✍”
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थैंक्स फॉर कमेंट्स
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good
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Thanks
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beautiful
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धन्यवाद
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Nice
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थैंक्स
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अति सुंदर
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धन्यवाद
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बहुत बढ़िया
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थैंक्स
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🙏
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उम्दा रचना और भाव
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कवि के लिए कलम किसी तलवार से कम नहीं होता वह स्वयं में ब्रह्मा होता है कुछ भी लिख सकता है किसी भी चीज का सृजन कर सकता है कवित्री अपना यही भाव इस कविता में दिखा रही है बहुत उम्दा बहुत सुंदर
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बहुत ही उम्दा
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