मेरी खिड़की से

मेरी खिड़की से
कोई ख्वाब निकल
फिर खो गया
इन हवाओं में
अब मैं खिड़की
बंद रखने लगा
अब ख्वाब आते है
भागते भी नहीं
बस इक घुटन सी
फैलती है उनके
साथ रहने से

हवा सी चीज़ है
ये ख़्वाब भी
बस महसूस होते है
इन्हे मुठी में
जकड नहीं सकते
ख्वाब हवाओं में ही
रहने को बने है
अब फिर मैंने
खिड़की खोल दी है
राजेश’अरमान’

Comments

2 responses to “मेरी खिड़की से”

  1. Rohan Sharma Avatar
    Rohan Sharma

    finest imagination and words

    1. rajesh arman Avatar
      rajesh arman

      thanx rohan

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