‘मेरे चाँद की मुस्कान’

बहुत दिनों बाद देखा
आज मैंने चाँद
मुस्कुरा रहा था,
लग रहा था खुश था !
आँखों में थी उसकी बदमाशियाँ
होंठों पर सजी थी खामोशियाँ
एक अर्से बाद
उसका दीदार हुआ
मुझे यूँ लगा के नया जनम हुआ
तरस गई हूँ मैं उसके दीदार के लिए
मन्नतें माँगती हूँ मैं उसके प्यार के लिए…

Comments

6 responses to “‘मेरे चाँद की मुस्कान’”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर

  2. वाह बहुत खूब लाजवाब अभिव्यक्ति

  3. Geeta kumari

    बहुत सुंदर रचना

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