मैं चाहती हूं मेरे लफ्जों में
गहराइयां हों
छूता चले मेरा हर अल्फाज आसमान को
मेरे भावों में वो ऊंचाइयां हो
तितली से रंग भरे हों पन्ने
और जवानी की अंगड़ाइयां हों
भवन में पसारा हुआ सन्नाटा गूंज उठे,
मेरे काव्य में वो रुबाईयां हों
कुछ ना हो तो बस
इतना हो भगवन !
मैं मरूँ और उसकी आँख में
कुछ झीसियाँ हों।।
मेरे लफ्जों में वो गहराइयां हों…!!
Comments
2 responses to “मेरे लफ्जों में वो गहराइयां हों…!!”
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वाह बहुत खूब
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धन्यवाद
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