जरा सा आप भी
कीजिये मुहब्बत,
यकीन मानिए,
सुनकू पाओगे।
जरा सा आप भी
सच की राह पर चलिए,
यकीन मानिये,
सुकून पाओगे।
जरा सा आप भी
त्याग करना सीखिए,
यकीन मानिए
सुकून पाओगे।
जरा आप भी
दान-धरम कीजिये,
यकीन मानिए
सुकून पाओगे।
जरा सा ठोस के
साथ नरम होइये
यकीन मानिए,
सुकून पाओगे।
यकीन मानिये
Comments
2 responses to “यकीन मानिये”
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कवि सतीश जी की बहुत सुन्दर कविता, कवि ने प्रत्येक पंक्ति में सुकून पाने की जो बातें लिखी हैं, यकीनन सत्य ही हैं… , लाजवाब लेखन..बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
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दिल को छू लेने वाली रचना है।
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