“याद आती है वो जग़ह”

याद आती है वो जग़ह,
जब कभी पक्की सड़कों पे चलते चलते,
थक जाता हूँ मैं और मन होता है,
की इस शोर से दूर जाकर किसी पेड़,
की छाह में बैठ जाऊँ और मिलूँ खुद से,
इक अरसा हुआ खुद से पूछा ही नहीं मैंने,
मुझे कहाँ जाना था और कहाँ हूँ मैं,
याद आती है वो जगह जब ऐसे सवाल
उभरते है जहन में,
,
याद आती है वो जगह जब चाहता हूँ देखना
ओस की बुँदे जो फसलों को सजाती सवारती थी।
सूरज की किरणों से मिलकर बेरंग होने के बावजूद
सातों रंग का एहसास कराती थी,
जैसे सजा हो रंगो का मेला कही पर।
और मैं खड़ा हूँ उनके बीच में ,
पर अचानक जैसे ख्वाब से जगाती है कोई आवाज़
और नजर जाती है मेरी इक गमले में लगे,
छोटे से फ़ूल के पौधे पर,
जो मुझे आकर्षित करना चाह रहा था।
अपनी ओर की अकेला होने के बावजूद
वो भी है और मैं भी हूँ जैसे कहना चाह रहा था,
परिस्थितियों को स्वीकार करों।
परिस्तिथियों को स्वीकार करों।।
@@@@RK@@@@

Comments

7 responses to ““याद आती है वो जग़ह””

    1. Ramesh Singh Avatar
      Ramesh Singh

      Thanks

  1. Ramesh Singh Avatar
    Ramesh Singh

    Thanks

  2. राम नरेशपुरवाला

    Good

  3. Abhishek kumar

    Good

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