सच्चा सच में रह गया, ठगा ठगा सा आज,
आशा चोरी कर गये, अपने धोखेबाज।
जिनके मन में जम रहा, काले धन पर नाज,
वे भी आज सफेद से, खूब दिखे नाराज।
भूखा चूहा रेंगता, देख रहा है बाज,
सोच रहा है चैन से, पेट भरूँगा आज।
आर्थिक हालत मंद है, यही सुना है आज,
बेकारी से गिर रही, है यौवन पर गाज।
पढ़ा-लिखा भूखा रहा, और खा रहे खीर,
कौन लिख रहा इस तरह, यौवन की तकदीर।
——— डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय
मात्रागत सुधार कर संशोधन प्रस्तुत।
यौवन की तकदीर (दोहा छन्द)
Comments
4 responses to “यौवन की तकदीर (दोहा छन्द)”
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“पढ़ा-लिखा भूखा रहा, और खा रहे खीर,
कौन लिख रहा इस तरह, यौवन की तकदीर।”
आजकल के बेरोजगारी भरे माहौल का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई कवि सतीश जी की दोहा छंद में बहुत ही सुंदर और सटीक रचना।
अति उत्तम प्रस्तुति -
अतिसुंदर भाव पूर्ण रचना। वाह वाह पाण्डेयजी क्या बात है!!!!
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वाह अतिसुन्दर
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बहुत खूब
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