मुह्हबत में तुम्हे आशु बहाना तक नहीं आया
बनारस में रहे और पान खाना तक नहीं आया
ये कैसे राश्ते से लेकर चले आये तुम मुझको
कहा का मयकदा एक चाय खाना तक नहीं आया
तेरे सीने में दम है दिल नहीं है
तेरा दम गर्मी ए महफ़िल नहीं है
निकल जा अक्ल के आगे की ये नूर
की ये चरागे राह है मंजिल नहीं है
अब चराग बज्म के सब जगमगाने वाले है
क्यों की अदब से बैठ जाईये रमेश पाल आने वाले है
डॉ रमेश सिंह पाल वैज्ञानिक, लेखक, आध्यात्मिक विचारक
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