रात भर करवटें मैं बदलता रहा

रात भर करवटें मैं बदलता रहा
अँधेरो में खुद को छलता रहा
टूटा नहीं जमाने की चोट से
साँसों की तपिश से पिघलता रहा
ताल्लुक नहीं था जिनसे मेरा
उनको भी ताउम्र सहता रहा
दिल में यादों का तूफां समेटे हुऐ
लबबस्ता मैं आँखों से कहता रहा
दिल-ए- मुज्तर को मैं कैसे समझाऊँ
जो पल पल तुमसे बिछड़ता रहा
शब भर सबा को शिकेबाई नहीं थी
झोंका चेहरे को छूकर गुज़रता रहा
दीदा-ए-नमनाक तुझे कैसे दिखाऊँ
मेरी हालत पर तू भी हँसता रहा
अंगड़ाइयों को कैदखाने में रखकर
तेरी यादों से सौदा करता रहा
दश्त-ए-तलब हर बार उजड़ जाता
तेरे गुस्से को जब तलक सहता रहा
अनमोल छतपुरिया
लबबस्ता- बंद होठ वाले
दिल-ए-मुज्तर- व्याकुल दिल
शिकेबाई- धैर्य
दीदा-ए-नमनाक- आसूं भरी आंखें
दश्त-ए-तलब- इच्छा का जंगल

Comments

2 responses to “रात भर करवटें मैं बदलता रहा”

  1. Ritu Soni Avatar
    Ritu Soni

    Very nice

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