एक तरफ धरती मा की करणवयथा
तौ दूसरी तरफ मानवमन है।
जौ मन मौसकर और सर पकडकर रौ रहा है।
धरती के लाल धरती की तरफ देखकर यह कैसी घडी है।
बाहार हन जल की झडी है।
नही पानी की ऐक बून दकही गीरी हौ।
सब तरफ बस तराही तराही करती मानव मन धरती के टूकडे टूकडे बीखर गये।
कीसान बेचारा मन ही मन मौसकर रहे जाता सर पकडकर रौ रहा है
अपनी बेबसी अपनी लाचारी पर कीसान कौ अपनी की समतके घने घने अनधकार के सीवा कुछ भी आतान नजर कभी वौ हसतातौ कभी वौ रूदेता जैसे दुख का पहाड गीर पडा हौ ऊस बेचारे कीसान पर की समतके
घने अनधकार की तरफ देखकर तराही तराही करूण वयथा हाय मै कीसकौ सुनाऊ
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