शक्ति जो है विधाता ,
फिर खेल है रचाए ।
कल तक थी,नदियां सूखी ,
आज बाढ़ बन डराए।
कुछ गाव ,कस्बे डूबे , कुछ जूझ रहे अभी भी।
पसरा है उनकी आंखों में मौत का सन्नाटा।
कुछ लोग लेते आनंद कुछ बन गए तमाशा ,
कैसा प्रकृति तेरा यह खेल है निराला।
इंसान जब भी चाहा भगवान बन के देखें,
उत्पत्ति खुद ही कर ले,
वह बस में मौत कर ले।
तब तक प्रलय मची है,
भगवान ने जताया।
एक शक्ति है विधाता ,
जिसका नहीं कोई सानी
निमिषा सिघल
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