तबाही मेरे मन की तुम
हंसी में लेके मत डोलो
मेरे गीतों को अपने
प्रेम के भेंट मत बोलो
जो कभी मरते-मिटते थे
मेरे अल्फाजों के दम पर,
कि अब देकर हमें कसमें
वो अब कहते हैं मत बोलो।।
“वो अब कहते हैं मत बोलो” (छंद बद्ध)
Comments
8 responses to ““वो अब कहते हैं मत बोलो” (छंद बद्ध)”
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बहुत सुंदर पंक्तियां
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Thanks
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बहुत सुंदर प्रस्तुति
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Thanks a lot
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Very nice
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Thank uuuu…
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अतिसुंदर रचना
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धन्यवाद सर
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