वो ज्यादा तो नहीं जानती
व्यवहारिकता भी नहीं जानती
वो सिर्फ इतना जानती है ,
कि वो कष्ट से प्यार नहीं कर सकती ।
शाम ढले ,देहरी पर खड़ी आसुओं का इंतजार नहीं कर सकती ।
फिर उन ऑखों में प्रशंसा के लिए ,श्रृंगार नहीं कर सकती।
उसकी लम्बी आयु के लिए,
व्रत, अनुष्ठान नहीं कर सकती।
स्त्री जो पा जाए, उसी में संतोष करे,
ऐसे विचारों का बखान नहीं कर सकती।
उसका दर्द देखकर,
न पिघले जो देवता
उसके मंदिर की पुजारिन,
वो नहीं हो सकती।
उस रोती- बिसूरती को तुम जड़ दो तमाचा,
पर नैनों से उसके, जाए न आशा
वो इतनी महान नहीं हो सकती।
जो उसे ही प्यार न कर पाए,
वो उसके दिए कष्ट से प्यार नहीं कर सकती।
वो हो सकती है प्रेयसी, पतिव्रता नारी,
पर वो नहीं हो सकती अबला, बेचारी।
वो सिर्फ इतना जानती है ,
कि वो कष्ट से प्यार नहीं कर सकती।
Saloni
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