खुल के भले ही न कहा हो कभी
पर अपनी “देह-बोली” से
कितनी ही बार जताती है वो
तुमसे कितना …..
कभी ख्याल किया तुमने
तुम्हारे कमरे के करीब से गुजरते वक़्त ठिठक कर कितनी ही बार
तुम्हें देख कर मुस्कुराती है वो
तुम्हारे टेक्स्ट-मेसेज़ का जवाब
अगले ही सेकेंड क्यूं दे देती है वो
फिर भले ही उसे जवाब देना
भूल ही क्यूं न जाओ तुम

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