वो मेरा रुहानी प्यार..

हाथ फैला कर श्वेत कुमुदिनी सी,
वो कर रही थी मेरा इंतज़ार।
ना जाने कब से करता था मैं
उससे प्यार ।
वो मेरा रुहानी प्यार..
जिसका कभी न किया मैनें इज़हार
वो समझी तो समझी कैसे ।
यह सोच कर हैरान हूँ
बढ़ चला उसकी ओर,
आखिर मैं एक इंसान हूँ।
वो पावन पूजा के दीपक की लौ सी,
उसको अपलक मैं देख रहा।
मुस्कुरा कर कहती है मुझे फ़रिश्ता,
रुहानी प्यार का है उससे रिश्ता॥
______✍गीता

Comments

4 responses to “वो मेरा रुहानी प्यार..”

  1. रोहित

    Bahut sunder rachna

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद रोहित जी

  2. Satish Chandra Pandey

    कवि गीता जी द्वारा रचित एक उच्चस्तरीय कविता। बहुत खूब

    1. Geeta kumari

      उत्साहवर्धन हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी

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