शैलेन्द्र जीवन से एक दिन शिला खण्ड जब टकराया,
पिता की छाया हटी तो जैसे संकट मुझपर गहराया,
संस्कारों का दम्ब था मुझमें सब धीरे-धीरे ठहराया,
मेरे कन्धों पर परिवार का जिम्मा जैसे बढ़ आया,
बचपन से ही कवि ह्रदय ने मेरे दिल को धड़काया,
बस इसी विधा में लगकर मैंने अपने मन को बहलाया,
बहुत रहा पल-पल उलझा इन सम्बंधों की उलझन में,
फिर किसी तरह से शैलेन्द्र जीवन को अपने मैंने सुलझाया।।
राही (अंजाना)
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