शोर भीतर भी है।
शोर बाहर भी है ।
ये ऐसा मंथन हैं।
जो चलता रहता है।
गुंजता रहता है।
हम शांत नहीं कर पाते।
बस बना लेते हैं।
शोर को अपनी आदत का हिस्सा।
शोर…
Comments
12 responses to “शोर…”
-

हम आदत से लाचार हो कर किसी के हिस्सा बन कर रह जाते है।
तब शुरू होती है हमारी जीवन की पहली अध्याय। -

धन्यवाद सर
-
अतिसुंदर भाव
-

धन्यवाद सर
-
-

अशांति का वातावरण चारों तरफ विद्यमान है
फिर इंसान उसे अपनी आदत का हिस्सा बना ही लेता है
बहुत सुंदर पंक्तियां -

सुन्दर समीक्षा के लिए हार्दिक धन्यवाद
-
सुन्दर अभिव्यक्ति
-

धन्यवाद जी
-
-
वाह क्या बात है
-

धन्यवाद सर
-
-
बहुत सुंदर पंक्तियां
-

धन्यवाद
-
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.