संसद और सिनेमा

संसद साहित्य और सिनेमा ।
सत्य और संस्कार का है खेमा।।
पर्दे और पुस्तकें सब
कल्पनाओं का संसार है।
कल्पना कहाँ दुनिया में
सत्य का ही एक प्रसार है।।
संसद के शिक्षित व संस्कारी
नेताओं का देख कारनामा।
मन पर चोट लगे हैं ऐसे
जैसे ज़िन्दगी हो एक सिनेमा।
हमने बेकार को वोट दिया।
बेकार ने हमको लूट लिया।।
बेकारी से हम सब मरते
वो लड़ते श्वान समान।
काटना नोचना फाड़ना
और पटकना मेज मचान।।
गलती अपनी थी बस इतनी
हमने बनाया गुण्डों का खेमा।
हाय रे संसद हाय रे सिनेमा।।

Comments

3 responses to “संसद और सिनेमा”

  1. Geeta kumari

    सुंदर भाव

  2. suman kumari Avatar
    suman kumari

    यथार्थ चित्रण किया है आपने ।
    बहुत हुआ इन जन प्रतिनिधियों को मनमानी
    अब नोटा से है इन्हें, इनकी योग्यता दिखानी

  3. Pratima chaudhary

    बहुत ही विचारणीय, यथार्थपरक

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