सिलिंडर न मिला

उज्ज्वला का सिलिंडर
सबको मिला,
सब खुश थे,
मगर वो रात भर सो न पाई।
यह सोचकर कि –
कोई मेरा नाम भी
लिस्ट में जोड़ देता
एक वोट तो मैं भी थी
उसकी आंखें भर आईं।
इधर दौड़ी उधर गई
गांव के मुखिया के पास गई
उसने लिस्ट देखी,
बोला आपका नाम नहीं है,
गलती मेरी नहीं
मुझसे पहले वालों की रही है।
अब तुम जाओ
जो हो पायेगा करेंगे,
तुम्हारी चिट्ठी बनाकर
ऊपर को भेजेंगे,
खुश होकर घर को आ गई,
सिलिंडर कभी न मिला
दूसरी पंचवर्षीय आ गई।

Comments

3 responses to “सिलिंडर न मिला”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    ये सरकारी सुविधा है साथी
    साथ किसी किसी को मिलता है।
    जैसे गूलर का फूल जगत में
    किसी बिरले को हीं दिखता है।।
    बहुत खूब। अतिसुंदर रचना।

  2. Geeta kumari

    सरकारी सहायता ना मिल पाने पर एक व्यथित गरीब स्त्री का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई कवि सतीश जी की हृदय स्पर्शी रचना

  3. बहुत सुन्दर सर

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