सुकून का सागर जैसे आँखों से बाँध बैठे हैं,
चेहरे चेहरों से ही जैसे अपना रिश्ता मान बैठे हैं,
चाहत नहीं है के मिल जाए ख़बर ज़मी से आसमान की,
वो तो हवाओं के हवाले से ही सभी जज़्बात जान बैठे हैं,
छू कर भी गुजर जाते हैं कभी ख़्वाब सर्द रातों में,
क्यों ख़्वाबों को हकीकत का वो पैगाम मान बैठे हैं।।
राही (अंजाना)
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