सुकून के पल कहां

तलाश करने जो चले
सुकून के पल
घूमकर आ गये वहीं
जहां से चले होके बेकल।
मन में भी सुकून नहीं
फिर ढूंढते फिरते कहां
जीवन पे ही छाया ग्रहण
छिनती सांसों की गिनती कहां
हर तरफ़ फैला है कैसा अनल
घूमकर आ गये वहीं
जहां से चले होके बेकल।
उम्मीद की किरण दिखती भी नहीं
जीने की ललक, थमती भी नहीं
परेशान हैं, परेशानी खलती भी नहीं
मृगतृष्णा सी फितरत जाने क्यूं है बनी
मरूद्दान‌ सी आश मन में सफल
घूमकर आ गये वहीं
जहां से चले होके बेकल।

Comments

18 responses to “सुकून के पल कहां”

  1. Chandra Pandey

    बहुत सुंदर भाव है। शिल्प में सुधार अपेक्षित है। जहां से होके चले बेकल के स्थान पर
    जहां से होकर चले बेकल।

    1. Rajeev Ranjan Avatar
      Rajeev Ranjan

      बेकल की जगह विकल ठीक रहता

    2. Suman Kumari

      सुझाव के लिए धन्यवाद।ध्यान रखूंगी

    3. Suman Kumari

      सुझाव एवं समीक्षा के लिए धन्यवाद

  2. Ekta

    बहुत सुंदर भाव

    1. Suman Kumari

      धन्यवाद

  3. राकेश पाठक

    Nice

    1. Suman Kumari

      धन्यवाद

  4. बहुत सुंदर रचना

    1. Suman Kumari

      धन्यवाद

    1. Suman Kumari

      धन्यवाद

  5. Amita

    अति उत्तम अभिव्यक्ति

    1. Suman Kumari

      धन्यवाद

  6. सुकून की तलाश में आदमी पूरी जिंदगी बेचैन रहता है अंत में उसे सुकून वही आता है जहां से उसने सुकून तलाशने की कोशिश की थी बहुत खूब

    1. Suman Kumari

      धन्यवाद

  7. Rajeev Ranjan Avatar
    Rajeev Ranjan

    बहुत सुंदर चित्रण, सुमन जी:-

    भूत वर्तमान भविष्य से जुड़ा है जीवन
    पृथ्वी करती है इसका सजीव चित्रण
    वर्तमान गुजरने को है
    भूत बनने को हैं
    भविष्य भी कमर कस तैयार है
    वर्तमान बनने पर उसका उभार है
    गोल सा इक चक्र है धरा के जैसा
    यूं भी कह सकते हैं कि
    भूत ही भविष्य बन सामने तैयार है
    सबक सिखाने को प्रकृति तैयार है
    संतुलन बनाने वाले से ही इसे प्यार है
    गलती की सजा जब कोई पाता है
    सबक न लेकर बोल वहीं दुहराता है
    फिर सजा कठिन मिलती सह न पाता है

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

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