सुनती आ रही हूं बातें दुनिया की
बातों में पता नहीं अपनापन कहीं खो जाता है
करती हैं बातें दुनिया जमाने भर की
मगर खुद को बयां नहीं कर पाता है
सुनती आ रही हूं बातें दुनिया की
Comments
10 responses to “सुनती आ रही हूं बातें दुनिया की”
-

Sahi kahan aapne
-
thanks panna
-
-

Subbanallah ………..kya kha h…aap ne….behtrin alfaaz
-
thanks pankaj
-
-

khud ko bayan krna……..bht mushkil h….nice!! 🙂
-
thanks ankit
-
-

nice poem anu!
-
thanks dear anjali
-
-

वाह
-
Waah
बातों में पता नहीं अपनापन कहीं खो जाता है
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.