चाहोगे जीतना तभी जीत पाओगे
मानोगे अपने हैं तभी अपनाओगे
लोभ और ईर्ष्या के दलदल से
जब तक निकलने की सोच ना होगी
मन के रावण को तुम कैसे जला पाओगे।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज
सोच
Comments
5 responses to “सोच”
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बहुत खूब
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धन्यवाद
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बहुत ख़ूब
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बहुत खूबसूरत पंक्तियां एवं भाव
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बहुत ही सुंदर
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