7 Comments

    1. बहुत बहुत आभार पन्नाजी।यह कविता एक तुलनात्मक विश्लेषण है——-गांवों के प्रति गहन उदासीनता और शहरों के अंधाधुंध आधुनिकीकरण का। दोनों ही स्थितियां भयावह हैं।

    1. धन्यवाद आदरणीय अनिरुद्ध जी।आपने रचना के मूल को समझा और सराहा इस हेतु आभार।सड़क और पगडंडी —–प्रतीक हैं; दो विशिष्ट जीवनशैली के।गांव ; भारत की रीढ़ हैं।

    1. हार्दिक आभार अनुप्रियाजी।कविता की आत्मा ही हमारे राष्ट्रीय विकास की विसंगतिपूर्ण नीतियों पर कटाक्ष है। पता नहीं क्यों हम गाँवों के शहरीकरण को सच्चा विकास मानने की भूल कर बैठे हैं।समग्र विकास की अवधारणा में गाँवों की उपस्थिति अहम् है——-जरुरी तो ये है कि, गाँवों को जीवन की मूलभूत सुविधाओं से समृद्ध कर अपने खास अंदाज में जीने दिया जाये।कृषि आधारित अर्थव्यवस्था कभी वैश्विक उतार–चढा़व से ध्वस्त नहीं होती —— प्रभावित भले ही होती हो।गांव हमारी आत्मा हैं—–हम अपनी आत्मा को मारकर समृद्धि पा सकते हैं लेकिन , शांति कतई नहीं।

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