हँसना भूल गए

आज अवसादो से जुङा है रिश्ता अपना
मुस्कुराना भूल गए, कहाँ होता है हंसना अपना
वो बात- बात पर रूठकर चुप होके बैठे रहना
थोड़ी- सी गुदगुदी पे खिलखिला के हंसना
गम की परछाई नहीं,इतरा के तितली-सा उङना
अब तो बस जिम्मेदारियों के बोझ तले दबना
मुस्कुराना भूल गए, कहाँ होता हंसना अपना ।

Comments

5 responses to “हँसना भूल गए”

  1. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. सादर आभार

  2. सुमन जी आप ने बहुत अच्छा लिखा है ❤❤धन्यवाद

  3. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    सुंदर भाव

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