हमारी रूह पर क़ब्ज़ा जमाने आ गई फिर से।
ये लड़की प्यार में पागल बनाने आ गई फिर से।।
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हमारे कब्र का रसता किसी से पूँछकर शायद।
वो पागल नींद से हमको जगाने आ गई फिर से।।
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सुलाने को तो आई थी वो दुनियाँ साथ में लेकर।
मगर अब बात क्या है जो उठाने आ गई फिर से।।
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सहारा हिज्र ने देकर हमें चलना सिखाया था।
मुहब्बत वस्ल के किस्से सुनाने आ गई फिर से।।
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दफ़ा कोई करो उसको कहो ख़ुद सामने आये।
ग़ज़ल का हुश्न ले कर के मनाने आ गई फिर से।।
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तुम्हारी रूह से साहिल उसे पीछा छुड़ाना है ।
तभी वो रूह को ज़िन्दा जलाने आ गई फिर से।।
#रमेश
हमारी रूह पर क़ब्ज़ा जमाने आ गई फिर से।
Comments
8 responses to “हमारी रूह पर क़ब्ज़ा जमाने आ गई फिर से।”
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वाह बहुत सुंदर रचना ढेरों बधाइयां
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शुक्रिया
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बहुत खूब
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शुक्रिया
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Nice
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Wah
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Awesome
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वाह क्या बात है
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