हम प्रेम को तुम्हारे एक दिन भुला ही देगे
आखिर सिसक सिसक कर कब तक भला जियेगे
मैं प्रेम की पुजारन या फिर कोई अभागन
तस्वीर तेरी छू कर बनती हूं मैं सुहागन
मंदिर में मस्जिदों में बस एक तुझको मांगा
तेरी सलामती को गुरुद्वारे धागा बांधा
याचनाएं विफल सब यूं भाग्य मेरे फूटे
ना राम काम आए घनश्याम मेरे छूटे
रहकर के भूखी प्यासी चंदा को अर्घ देकर
तेरी उमर हो लंबी व्रत को किया करेंगे।
हम प्रेम को तुम्हारे एक दिन भुला ही देगे
आखिर सिसक सिसक कर कब तक भला जियेगे।
तुम बांहों में किसी के रहते थे सोए सोए
हमसे भी पूंछ लेते हम कितनी देर रोए
आते थे मुस्कुराते मुझको सुकून बताने
कैसे थी गम छुपाती ये मेरा दिल ही जाने
तेरी नजर को अपनी नजरों से मैं उतारूं
तुम हो फकत हमारे कह कर के मन संभालूं
तेरे फरेब को भी लाचारी कहते हैं हम
तुम हो तो बेवफा ही पर कृष्ण हम कहेंगे।
हम प्रेम को तुम्हारे एक दिन भुला ही देगे
आखिर सिसक सिसक कर कब तक भला जियेगे।
मैं आहुति तुम्हारी तुम संविधा हवन की
तुम पाठ भागवत का मैं बेला आचमन की
ये राज- काज, संपति, ये जोग, भोग सारे
तेरे नयन की चितवन के आगे व्यर्थ सारे
हर्षित हुईं छुअन से कलियां जो थी कुम्हलाई
अंबर बरस पड़ा तो धरती को लाज आई।
इस बार चूक थोड़ी हमसे जो हो गई है
है प्रण यही हमारा अगले जनम मिलेंगे।
अगले जनम तुम्हारा हम ही वरण करेंगे।
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